ड्यूटी के दौरान दृष्टिहीन हुए CRPF जवान को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, 1.25 करोड़ रुपये मुआवजा
कोर्ट ने कहा, आदर्श नियोक्ता की जिम्मेदारी निभाने में विफल रही CRPF, सेवा से हटाने के बजाय वैकल्पिक पद देना चाहिए था।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने ड्यूटी के दौरान दृष्टिहीन हुए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के एक पूर्व कांस्टेबल को बड़ी राहत देते हुए 1.25 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि CRPF ने एक आदर्श नियोक्ता की तरह व्यवहार नहीं किया और सेवा के दौरान दिव्यांग हुए कर्मचारी को वैकल्पिक पद पर समायोजित करने के बजाय चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित कर सेवा से बाहर कर दिया।
न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। हालांकि, कर्मचारी के सेवानिवृत्ति की आयु पार कर जाने के कारण बहाली के आदेश में संशोधन करते हुए अदालत ने 1.25 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। इस राशि में बकाया वेतन, ब्याज और मुकदमे की लागत शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की धारा 47 अनिवार्य है। यदि किसी कर्मचारी को सेवा के दौरान दिव्यांगता होती है, तो उसे समान वेतन और सेवा लाभ वाले किसी अन्य पद पर समायोजित किया जाना चाहिए। यदि ऐसा संभव न हो तो नियोक्ता को सुपरन्यूमेरी (अतिरिक्त) पद सृजित कर उसे सेवा में बनाए रखना चाहिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि CRPF द्वारा जिस 2002 की अधिसूचना का हवाला दिया गया, वह इस मामले पर लागू नहीं होती क्योंकि कर्मचारी को वर्ष 1998 में चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित किया गया था। न्यायालय ने कहा कि कोई भी अधिसूचना या प्रत्यायोजित कानून पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए CRPF का तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता।
