रवीन्द्र जयंती समारोह की सांस्कृतिक छटा, “श्यामा” की प्रस्तुति ने बांधा समां

हुडको कालीबाड़ी परिसर में संगीत, नृत्य और साहित्य का अद्भुत संगम, गुरुदेव को दी गई भावपूर्ण श्रद्धांजलि

रवीन्द्र जयंती समारोह की सांस्कृतिक छटा, “श्यामा” की प्रस्तुति ने बांधा समां

भिलाई। रवीन्द्रनाथ टैगोर की जयंती के पावन अवसर पर रविवार संध्या हुडको कालीबाड़ी परिसर श्रद्धा, संस्कृति और संगीत की सुरमयी छटा से आलोकित हो उठा। “रवीन्द्र निकेतन, हुडको, भिलाई” द्वारा आयोजित भव्य “रवीन्द्र जयंती समारोह” में साहित्य, संगीत, नृत्य और भावनाओं का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिला, जिसने उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम के अत में प्रतिभागियों के उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखते हुए मंदिर समिति की ओर से रूपक दत्ता और श्यामल रॉय द्वारा 11 हजार रुपए उपहार स्वरूप प्रदान की गई।

कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीमती शेफाली दास द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ। इसके बाद गुरुदेव की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। दीपशिखाओं की दिव्य आभा और रवीन्द्र संगीत की मधुर स्वर-लहरियों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक गरिमा से भर दिया। रवीन्द्र निकेतन की महिला सदस्यों द्वारा प्रस्तुत सामूहिक गीत और भावपूर्ण काव्य-पाठ ने समारोह को साहित्यिक ऊष्मा और सांस्कृतिक सौंदर्य से सराबोर कर दिया।

बाल कलाकारों की नृत्य-नाटिकाएं समारोह का विशेष आकर्षण रहीं। सहज अभिव्यक्ति, मनोहारी मुद्राओं और लयात्मक प्रस्तुति ने दर्शकों का मन मोह लिया। रंग-बिरंगी वेशभूषा, मधुर संगीत और सजीव अभिनय ने मानो गुरुदेव की रचनात्मक चेतना को मंच पर जीवंत कर दिया। सभागार देर तक तालियों की गूंज से गूंजायमान होता रहा।

समारोह का मुख्य आकर्षण गुरुदेव की कालजयी नृत्य-नाटिका “श्यामा” का विशेष मंचन रहा। “रवीन्द्र निकेतन, हुडको” के सचिव श्री रूपक दत्ता एवं कला साहित्य अकादमी, छत्तीसगढ़ (कवच) के सचिव श्री बबलू विश्वास के विशेष अनुरोध पर सुप्रसिद्ध निर्देशिका एवं कलाकार अनन्या बर्मन के निर्देशन में प्रस्तुत इस नृत्य-नाट्य ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। संगीत, नृत्य और अभिनय की त्रिवेणी ने प्रेम, वेदना और मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया।

कार्यक्रम में शहर के साहित्यकारों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों और संस्कृति-प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। आयोजन समिति ने कहा कि गुरुदेव की रचनाएं आज भी मानवता, प्रेम और विश्वबंधुत्व का अमर संदेश देती हैं तथा नई पीढ़ी को भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य कर रही हैं।

श्रद्धा, सौंदर्य और सांस्कृतिक गरिमा से ओत-प्रोत यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि रवीन्द्र दर्शन की जीवंत अनुभूति बन गया, जिसकी मधुर स्मृतियां लंबे समय तक लोगों के मन में बनी रहेंगी।